परम्परागत राजनीति विज्ञान को परिभाषित करें एवं इसकी प्रकृति एवं क्षेत्र का वर्णन करें।

परम्परागत राजनीति विज्ञान को परिभाषित करें एवं इसकी प्रकृति एवं क्षेत्र का वर्णन करें।


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में जन्म लेता है और समाज में ही रह कर अपने जीवन का पूर्ण विकास करता है। समाज के बिना वह रह ही नहीं सकता।

संगठित समाज में जब एक ऐसी संस्था की स्थापना हो जाए जिसके द्वारा उस समाज का शासन चलाया जा सके तथा वह समाज सत्ता सम्पन्न हो और एक निश्चित भू-भाग में निवास करता हो तो वह राज्य बन जाता है।

राज्य के अन्दर रहकर ही मनुष्य अपना विकास कर सकता है। राज्य की एजेन्सी सरकार द्वारा राज्य की इच्छा को व्यक्त किया जाता है और वही इस इच्छा को लागू करती है। वह शास्त्र जो राज्य और सरकार की जानकारी देता है, उसे हम राजनीतिशास्त्र कहते हैं।

राजनीति-विज्ञान की परम्परागत परिभाषाएँ (Traditional Definitions of Political Science)


राजनीति-विज्ञान की परम्परागत परिभाषाओं को हम तीन भागों में बांट सकते हैं-

(क) राजनीति-विज्ञान राज्य से संबंधित है (Political Science is concerned with the State only) :

कुछ विद्वानों के मतानुसार राजनीतिशास्त्र का संबंध केवल राज्य से है। ब्लंटशली (Bluntschli), गार्नर (Garner), गैटेल (Gettell), गैरीज (Garies) आदि इस विचार के मुख्य समर्थक हैं-

1. ब्लंटशली (Bluntschli) के मतानुसार, "राजनीतिशास्त्र उस विज्ञान को कहा जाता है जिसका संबंध राज्य से है और जिसमें राज्य की मूल प्रकृति, उसके रूपों, विकास तथा उसकी आधारभूत स्थितियों को समझने और जानने का प्रयत्न किया जाता है।"

2. प्रो. गार्नर (Prof. Garner) के मतानुसार, "राजनीतिशास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य के साथ होता है।"

(ख) राजनीति-विज्ञान सरकार के साथ संबंधित है (Political Science is concerned with the Government)

कुछ विद्वान राजनीति-विज्ञान को सरकार के अध्ययन तक सीमित मानते हैं। सीले, लीकॉक आदि विद्वान इसी विचार के समर्थक हैं- 

(1). सीले (Seeley) का कहना है कि "जिस प्रकार राजनीतिक अर्थव्यवस्था सम्पत्ति का, प्राणिशास्त्र जीवन का, बीजगणित अंकों का और रेखागणित स्थान और इकाई का अध्ययन करता है, उसी प्रकार राजनीतिशास्त्र शासन-प्रणाली का अध्ययन करता है।"

(2). डॉ. लीकॉक (Leacock) के अनुसार, "राजनीतिशास्त्र से संबंधित है।" 

(ग) राजनीति-विज्ञान राज्य तथा सरकार से संबंधित है (Political Science concerned with State and Government) : 

कुछ विद्वानों के विचारानुसार, "राजनीति विज्ञान में राज्य और सरकार दोनों का अध्ययन किया जाता है। गैटेल, गिलक्राइस्ट, पाल जैनेट तथा लॉस्की ने इसी विचार का समर्थन किया है-

(i). फ्रांसीसी लेखक पाल जैनेट (Paul Janet) के अनुसार, "राजनीतिशास्त्र समाजशाख का वह भाग है जो राज्य के आधारों तथा सरकार के सिद्धांतों का अध्ययन करता है।"

(ii). गैटेल (Gettell) के अनुसार, "राजनीतिशास्त्र को राज्य का विज्ञान कहा जा सकता है। इसका संबंध उन व्यक्तियों के समुदायों से है जो राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं,

उनकी सरकारों के संगठन से है और सरकारों के कानून बनाने तथा लागू करने और अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों वाली गतिविधियों से है। इसके मुख्य विषय राज्य, सरकार तथा कानून है।"

राजनीति-विज्ञान की आधुनिक परिभाषाएँ (Modern Definitions of Political Science)


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद राजनीतिशास्त्र की परिभाषा के संबंध में एक नवीन दृष्टिकोण का उदय हुआ है, जो निश्चित रूप से अधिक व्यापक और अधिक यथार्थवादी है। व्यवहारवादी क्रान्ति ने राजनीतिशास्त्र की परिभाषाओं को नया रूप दिया है।

अतः आधुनिक राजनीतिक वैज्ञानिक राजनीतिशास्त्र की परम्परावादी परिभाषाओं को सर्वथा गलत मानते हैं। राजनीति- विज्ञान के आधुनिक दृष्टिकोण की मांग है कि इस शास्त्र को केवल राज्य अथवा शासन के अध्ययन तक सीमित रखना अनुचित है।

कैटलिन, लासवैल, मेरियम, राबर्ट डहल, डेविड ईस्टन, आल्मण्ड तथा पाँवल, मैक्स वेबर आदि राजनीतिशास्त्र के आधुनिक दृष्टिकोण के प्रतिनिधि विद्वान हैं।

डेविड ईस्टन (David Easton) के अनुसार, "राजनीतिशास्त्र सामाजिक मूल्यों के अधिकारिक निर्धारण (Authoritative Allocation of Values) का अध्ययन है।

" ईस्टन ने राजनीतिशास्त्र के अध्ययन-क्षेत्र में तीन बातों- नीति, सत्ता और समाज (Policy, Authority and Society) को प्रमुख माना है।

आल्मण्ड और पाॅवेल (Almond and Powell) ने कहा है कि आधुनिक राजनीति- विज्ञान में हम 'राजनीतिक व्यवस्था' का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं।

स्पष्ट है कि आधुनिक विद्वान राजनीतिशास्त्र की परिभाषा पर एकमत नहीं है। कोई उसे मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार के अध्ययन का शास्त्र मानता है,

कोई इसे शक्ति के अध्ययन का तथा कोई सत्ता के अध्ययन का और इन समस्त आधुनिक दृष्टिकोणों का समन्वय करते हुए राबर्ट डहल (Robert Dahl) ने कहा है कि "राजनीतिक विश्लेषण का शक्ति, शासन अथवा सत्ता से संबंध है।"

आधुनिक राजनीतिक विद्वानों में कई मतभेदों के बावजूद भी इस संबंध में विचार साम्य है कि वे राजनीतिशास्त्र को अब राज्य या सरकार का विज्ञान नहीं मानते हैं। उनका आग्रह है कि मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार का, शक्ति का, सत्ता का, मानव समूह की अन्तःक्रियाओं का विज्ञान है।

निष्कर्ष (Conclusion): राजनीतिशास्त्र की परिभाषा के संबंध में अपनाया गया यह आधुनिक दृष्टिकोण भी एकांगी ही है। शक्ति राजनीतिशास्त्र के विभिन्न अध्ययन विषयों में से केवल एक है, एकमात्र नहीं।

अतः राजनीतिकशास्त्र के कुछ विद्वानों विशेषतः वी. ओ. के (V.O. Key), जे. रोलैंड, पिनॉक व डेविड जी. स्मिथ आदि के द्वारा इस विषय की परिभाषा के संबंध में परम्परागत और आधुनिक दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया है।

पिनॉक और स्मिथ (Penock and Smith) ने पूर्णतया संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए लिखा है- "इस प्रकार राजनीति-विज्ञान किसी भी समाज में उन सभी शक्तियों, संस्थाओं तथा संग नात्मक ढांचों से संबंधित होता है

जिन्हें उस समाज में सुव्यवस्था की स्थापना बनाए रखने, अपने सदस्यों के अन्य सामूहिक कार्यों के सम्पादन तथा उनके मतभेदों का समाधान करने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अन्तिम सत्ता माना जाता है।"

राजनीतिशास्त्र की प्रकृति (Nature of Political Science)


A. परम्परागत दृष्टिकोण से राजनीतक विज्ञान की प्रकृति- परम्परागत दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान की निम्न विशेषताएँ हैं

(i) कल्पनावादी और आदर्शी परम्परागत राजनीति विज्ञान में राजनीतिक व्यवस्थाओं के बारे में कोई कल्पना मस्तिष्क में कर ली जाती है, तत्पश्चात् उस कल्पना को रचनात्मक रूप दिया जाता है।

(ii) अपरिष्कृत परम्परागत विधियाँ- परम्परागत राजनीति विज्ञान अध्ययन पद्धति की दृष्टि से इतिहासवादी, दर्शन प्रधान और वर्णनात्मक रहा है। डॉ० वर्मा के अनुसार इसके विकास की चार अवस्थाएँ है-ऐतिहासिक, विश्लेषणात्मक, आदर्शात्मक-उपदेशात्मक, तथा वर्णनात्मक-परिभाषात्मक।

(iii) नैतिकता और सामाजिक मूल्यों पर विशेष बल - परम्परागत राजनीति विज्ञान उपदेशात्मक है, जो नैतिकता और राजनीतिक मूल्यों पर बल देता है। इसका मुख्य सरोकार है- 'क्या होना चाहिए' और कार्य है- 'नैतिक निर्णय देना'।

(iv) राज्य एक नैतिक संस्था है- परम्परागत दृष्टिकोण राज्य को नैतिक संस्था मानता है। यह राज्य को उच्चतम जीवन का साधन मानता है। अरस्तू के अनुसार, "राज्य का अस्तित्व सजीवन के लिए है, मात्र जीवन के लिए नहीं।"

(v) कानूनी-औपचारिक संस्थागत अध्ययन पर बल- परम्परागत राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन का बिम्ब राजनीतिक और सरकारी संस्थाओं का ही रहा और इसका अध्ययन भी कानूनी, औपचारिक और संस्थागत था।

(vi) प्रधानतः संकुचित अध्ययन- परम्परागत राजनीति विज्ञान के लेखकों की विशेषता रही है इनके अध्ययन प्रमुखतः पाश्चात्य राज्यों की शासन व्यवस्था की संकीर्ण परिधि में बंधे रहे।

B. आधुनिक दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान की प्रकृति- आधुनिक दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान की प्रकृति विज्ञान की प्रकृति की निम्न विशेषताएँ हैं-

(i) वैज्ञानिकता - आधुनिक राजनीतिशास्त्री अपने अध्ययन को अधिक वैज्ञानिक बनाना चाहते हैं। वे राजनीतिक घटनाओं एवं तथ्यों को वैज्ञानिकता की कसौटी पर कसकर उनकी जाँच करते हैं। वे प्राकृतिक विज्ञान और अन्य समाज विज्ञानों की नई-नई तकनीकों का प्रयोग करते हैं।

(ii) मूल्य मुक्त अध्ययन- आधुनिक दृष्टिकोण मूल्य मुक्त अध्ययन पर बल

देता है। यह मानवीय मूल्यों-नैतिकता, न्याय और स्वतन्त्रता पर कोई बल नहीं देता है। 

(iii) अन्तः अनुशासनात्मक अध्ययन पर बल- आधुनिक दृष्टिकोण की प्रकृति अन्तः अनुशासनात्मक अध्ययन पर जोर देती है। आधुनिक विद्वानों ने समाज विज्ञान, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र इत्यादि विषयों पर काफी लिखा है।

(iv) पूर्णतया नई राजनीतिक शब्दावली का प्रयोग- आधुनिक राजनीति विज्ञानी पूर्णतया नई शब्दावली एवं अवधारणाओं का प्रयोग करने लगे हैं। अब राजनीति विज्ञान का अध्ययन राजनीतिक विकास, आधुनिकीकरण, राजनीतिक संस्कृति और राजनीतिक समाजीकरण जैसी अवधारणाओं के परिप्रेक्ष्य में होने लगा है।

(v) शोध एवं सिद्धान्त में घनिष्ठ सम्बन्ध आधुनिक राजनीति विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य राजनीति के सैद्धान्तिक प्रतिमानों को विकसित करना है। इसी आधार पर वे राजनीतिक तथ्यों एवं घटनाओं के सम्बन्ध में खोज करते हैं एवं उसका विश्लेषण करते हैं।

(vi) यथार्थवादी, व्यवहारपरक अध्ययनों पर बल आधुनिक राजनीति विज्ञानी यथार्थवादी एवं तथ्यपरक अध्ययनों पर बल देते हैं। इसमें राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन के स्थान पर व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार के विश्लेषण पर बल दिया जाने लगा है।

राजनीतिशास्त्र का विषय-क्षेत्र (Scope of Political Science)


राजनीतिशास्त्र की परिभाषा की भांति इसके अध्ययन क्षेत्र से संबंधित भी दो दृष्टिकोण है- (क) परम्परागत दृष्टिकोण, तथा (ख) आधुनिक दृष्टिकोण।

(i) परम्परागत दृष्टिकोण: परम्परागत दृष्टिकोण के अनुसार राजनीतिशास्त्र का विषय-क्षेत्र इस प्रकार है-

1. राज्य का अध्ययन (Study of State): राजनीतिशास्त्र राज्य का विज्ञान है और इसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है। गैटेल के मतानुसार राजनीतिशास्त्र राज्य के अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का अध्ययन करता है।

(क) राज्य के अतीत का अध्ययन (The State as it had been) : राज्य वह धूरी है जिसके इर्द-गिर्द राजनीतिशास्त्र घूमता है, परन्तु राज्य का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसमें राज्य की उत्पत्ति, उसके विस्तार एवं राजनीतिक संस्थाओं तथा विचारधाराओं के बदलते हुए स्वरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ख) राज्य के वर्तमान का अध्ययन (The State as it is): राजनीतिशास्त्र राज्य के वर्तमान स्वरूप का अध्ययन भी करता है। इसमें, राज्य क्या है, राज्य के तत्व कौन से हैं, राज्य की प्रकृति,

राज्य के राज्य के अपने नागरिकों के साथ सम्बन्ध तथा राज्य अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए क्या-क्या साधन प्रयोग करता है, का अध्ययन किया जाता है। इसके अध्ययन का सीमा-क्षेत्र बहुत विस्तृत है।

(ग) राज्य के भविष्य का अध्ययन (The State as it ought to be) : राज्य- का यह कर्तव्य है कि वह राज्य के अतीत तथा वर्तमान का पूर्ण ज्ञान लेकर भविष्य के लिए भी सुझाव दे ताकि राज्य की मशीनरी इस ढंग की हो कि जनता का अधिक-से- अधिक कल्याण हो सके।

इसमें हम यह देखते हैं कि भविष्य में राज्य कैसा होना चाहिए तथा क्या एक अंतर्राष्ट्रीय राज्य की स्थापना हो सकेगी कि नहीं?

2. सरकार का अध्ययन (Study of Government): सरकार राज्य का अभिन्न भाग है। सरकार के बिना राज्य की स्थापना नहीं की जा सकती। सरकार राज्य की ऐसी एजेंसी है जिसके द्वारा राज्य की इच्छा को प्रकट तथा कार्यान्वित किया जाता है। राज्य के उद्देश्यों की पूर्ति सरकार द्वारा ही की जाती है।

राजनीतिशास्त्र में हम अध्ययन करते हैं कि-सरकार क्या है, इसके अंग कौन-से हैं, इसके कार्य क्या हैं तथा इसके विभिन्न रूप कौन-से हैं?

3. शासन प्रबंध का अध्ययन (Study of Administration): कर्मचारियों की नियुक्ति, स्थानान्तरण, अवकाश आदि सभी बातें जो लोक प्रशासन में आती है, राजनीतिशाख से संबंधित होती है अतः इन सबके लिए राजनीतिशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है।

4. मनुष्य का अध्ययन (Study of Man): 

मनुष्य को मिलाकर राज्य बनता है। राजनीतिशास्त्र, जिसमें मुख्यतः राज्य का अध्ययन किया जाता है, मनुष्य का अध्ययन भी करता है। इसमें मनुष्यों का राज्य के साथ क्या संबंध है, उनके अधिकार और कर्तव्य तथा नागरिकता की प्राप्ति एवं लोप इत्यादि बातों का अध्ययन किया जाता है।

5. समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन (Study of Associations and Institutions) :

राज्य के अन्दर कई प्रकार के समुदाय और संस्थाएँ होती हैं जिनके द्वारा मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है।

राजनीतिशास्त्र इन विभिन्न समुदायों और संस्थाओं का अध्ययन भी करता है। इसके अतिरित चुनाव प्रणाली, जनमत का संगठन, दबाव गुट, लोक-सम्पर्क की व्यवस्था, प्रसारण के साधन आदि के बारे में राजनीतिशास्त्र में अध्ययन किया जाता है।

6. राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन (Study of Political Thought):

राज्य क्या है? राज्य के पास कौन-कौन से अधिकार व शक्तियाँ हैं और उनकी क्या सीमाएँ

हो सकती हैं? राज्य की आज्ञाओं को लोग क्यों मानें? किन-किन व्यवस्थाओं में लोगों को राज्य की आज्ञाओं की अवहेलना करने का अधिकार होना चाहिए? राज्य की शक्ति व लोगों के अधिकारों के मध्य कहां लकीर खींची जाए?

ऐसे बहुत से महत्वपूर्ण और मौलिक प्रश्नों के उत्तर समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक विद्वानों व विचारकों ने दिये हैं।

अतः इन सब बातों का अध्ययन हम राजनीतिशास्त्र में करते हैं। आदर्शवाद, व्यक्तिवाद, उपयोगितावाद, फासिज्म, गाँधीवाद आदि का अध्ययन राजनीतिशास्त्र में किया जाता है।

7. राजनीतिक दलों का अध्ययन (Study of Political Parties) : आज के लोकतंत्रात्मक युग में राजनीतिक दलों का महत्वपूर्ण स्थान है। राजनीतिशास्त्र में विभिन्न राजनीतिक दलों के संगठन, इनके कार्यों, गुणों तथा अवगुणों का अध्ययन किया जाता है।

8. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संगठन का अध्ययन (Study of International Politics and Organisation) :

राजनीतिशास्त्र में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का भी अध्ययन किया जाता है।

राजनीतिशास्त्र में युद्ध, शांति तथा शक्ति-संतुलन की समस्याओं पर विचार किया जाता है। प्रथम महायुद्ध के पश्चात् राष्ट्र संघ और द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी। राजनीतिशास्त्र में राष्ट्र संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठन, कार्यों, सफलताओं एवं असफलताओं आदि का अध्ययन किया जाता है।

(ख) राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र के संबंध में आधुनिक दृष्टिकोण (Scope of Political Science as Most Modern Point of View) : 

आधुनिक दृष्टिकोण का राजनीतिक क्षेत्र अत्यधिक व्यापक है। आधुनिक विद्वानों ने राजनीतिशास्त्र की नई दिशाएँ निर्धारित की हैं।

डॉ. वीरकेश्वर प्रसाद सिंह के शब्दों में, "इसे वैज्ञानिकता प्रदान करने के दृष्टिकोण से रूढ़िवादी विषयों, जैसे-राज्य के लक्ष्य, सर्वश्रेष्ठ सरकार, औपचारिक संस्थाओं का अध्ययन, ऐतिहासिक पद्धति आदि को इससे विलग कर दिया गया है।

मूल्यों, राज्यों एवं उसकी संस्थाओं के बदले मनुष्य के राजनीतिक व्यवहार तथा राजनीतिक गतिविधियों का अध्ययन राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत किया जाने लगा है।

" 1967 में अमेरिकन पोलिटिकल साईस ऐसोसिएशन ने राजनीतिशास्त्र के विषय-क्षेत्र का निर्धारण करते समय इसके 27 उपक्षेत्रों की चर्चा की है।

इनमें मुख्य हैं- मनुष्य व उसका राजनीतिक व्यवहार, समूह, संस्थाएँ, प्रशासन, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, सिद्धांत, विचारवाद, मूल्य, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, सांख्यिकीय सर्वेक्षण, शोध पद्धतियाँ आदि।

आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीतिशास्त्र के क्षेत्र में मुख्यतः अग्रलिखित का भी अध्ययन किया जाता है-

1. शक्ति तथा सत्ता का अध्ययन (Study of Power and Authority) : आधुनिक दृष्टिकोण के अनुसार राजनीतिशास्त्र में शक्ति तथा सत्ता का अध्ययन भी किया जाता है।

2. प्रभाव का अध्ययन (Study of Influence) : शक्ति के साथ प्रभाव भी राजनीति का केन्द्रीय विषय है। अतः राजनीतिशास्त्र में प्रभाव का भी अध्ययन किया जाता है।

3. नेतृत्व का अध्ययन (Study of Leadership) : राजनीतिशास्त्र में नेतृत्व का भी अध्ययन किया जाता है।

4. मूल्यों के सत्तात्मक निर्धारण का अध्ययन (Study of Authoritative Allocation of Values) : डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीतिशास्त्र सामाजिक मूल्यों के सत्तात्मक निर्धारण का अध्ययन है।

5. राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन (Study of Political System) : राजनीतिशास्त्र सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन करता है।

6. राजनीतिक संस्कृति तथा राजनीतिक समाजीकरण का अध्ययन : राजनीतिशास्त्र में राजनीतिक संस्कृति तथा राजनीतिक समाजीकरण का अध्ययन किया जाता है।

7. नीति-निर्माण का अध्ययन : लॉसवैल के अनुसार राजनीतिशास्त्र में नीति निर्माण का अध्ययन किया जाता है।

निष्कर्ष (Conclusion): राजनीतिशास्त्र के विषय-क्षेत्र के इस अध्ययन से पता चलता है कि इसका क्षेत्र बहुत विशाल है। इसमें राज्य, सरकार, मनुष्य, समुदाय तथा संस्थाओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें कानून तथा विश्व समस्याओं का भी अध्ययन किया जाता है।

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